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वानर सेना से ब्रह्मज्ञान की सामूहिक साधना करवाकर श्रीराम ने किया संघ शक्ति का निर्माणः साध्वी दीपिका भारती

देहरादून, । देवभूमि देहरादून में दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान द्वारा आयोजित दिव्य श्रीराम कथा का षष्ठम दिवस एक ऐसे आध्यात्मिक उत्कर्ष का साक्षी बना, जहाँ रामायण के दिव्य प्रसंग केवल सुनाए नहीं गए, बल्कि चेतना के स्तर पर अनुभव कराए गए। दिव्य गुरु आशुतोष महाराज के दिव्य मार्गदर्शन में कथा व्यास साध्वी दीपिका भारती ने जब जानकीनाथ सहाय करें, कौन बिगाड़ करे नर तेरो विषय के माध्यम से शरणागति, गुरु कृपा, शक्ति जागरण और आंतरिक विजय के उन सूक्ष्म आयामों को उद्घाटित किया, जहाँ रामायण मानव जीवन की आध्यात्मिक उन्नति उन्नति का मार्ग प्रशस्त करती है। कथा का प्रवाह उस दिव्य प्रसंग से आगे बढ़ा, जब हनुमान जी लंका दहन कर तथा माता सीता का संदेश लेकर पुनः प्रभु श्रीराम के समक्ष उपस्थित हुए। भक्ति और समर्पण के इस अनुपम प्रसंग को कथा व्यास जी ने अत्यंत मार्मिक एवं भावपूर्ण शैली में प्रस्तुत किया। यह आत्मा और परमात्मा के उस अद्वितीय संबंध का चित्रण था, जहाँ भक्त का समर्पण पूर्णतः अहंकारशून्य होकर केवल प्रेम और सेवा में विलीन हो जाता है।
जब हनुमान जी ने लंका में घटित समस्त घटनाक्रम को अत्यंत सरल, विनम्र और भोले भाव से प्रभु श्रीराम के समक्ष निवेदित किया, तब प्रभु स्वयं भावविभोर हो उठे और कह बैठे ष्सुनु सुत तोहि उरिन मैं नाहीं। देखेउँ करि बिचार मन माहींघ्”यह भक्ति की वह परम अवस्था है, जहाँ स्वयं परमात्मा भी अपने भक्त के प्रेम और निस्वार्थ सेवा के आगे स्वयं को ऋणी अनुभव करने लगते हैं। कथा में अत्यंत सुंदर ढंग से यह भाव प्रकट हुआ कि जब भक्ति पूर्णतः निष्काम हो जाती है, तब परमात्मा और भक्त के मध्य कोई दूरी शेष नहीं रहती; उनका संबंध औपचारिक नहीं, आत्मीय हो जाता है। हनुमान जी की सेवा में श्मैंश् का पूर्ण विसर्जन हो चुका था। वहाँ केवल प्रेम, समर्पण और अखंड प्रभु स्मरण ही शेष था। यही जागृत चेतना उन्हें श्रीराम के दिव्य अभियान का अनिवार्य और अविभाज्य अंग बना देती है।कथा को आगे बढ़ाते हुए कथा व्यास जी ने धर्म और अधर्म के उस निर्णायक संघर्ष की गाथा का वर्णन किया, जहाँ श्रीराम की सेना धर्म, संतुलन और लोककल्याण के लिए जागृत सामूहिक चेतना का प्रतीक बन चुकी थी। पारंपरिक उद्घोष, भक्तिमय स्वर और वीर रस से ओतप्रोत वातावरण ऐसा अनुभव करा रहा था मानो त्रेता युग की चेतना पुनः वर्तमान में प्रवाहित हो उठी हो।
इसी प्रवाह के मध्य कथा ने लंका के भीतर घटित हो रहे एक अत्यंत महत्वपूर्ण आंतरिक परिवर्तन की ओर ध्यान केंद्रित किया विभीषण से श्भक्त विभीषणश् बनने की यात्रा।
कथा व्यास जी ने इस प्रसंग को अत्यंत मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक गहराई से उद्घाटित किया। विभीषण अब तक रावण की सत्ता, वैभव और सामर्थ्य के मध्य जीवन व्यतीत कर रहे थे, किंतु हनुमान जी के आगमन के पश्चात उनके भीतर चेतना का जागरण होने लगा। पहली बार उन्होंने सत्ता के सम्मुख सत्य कहने का साहस किया। उन्होंने रावण को समझाया कि श्रीराम कोई साधारण राजा नहीं हैं और माता सीता का हरण धर्म के विरुद्ध खड़ा हुआ एक गंभीर अधर्म है।
ष्विनाशकाले विपरीत बुद्धिष् की कहावत को चरितार्थ करते हुए कथा में यह भी स्पष्ट किया गया कि विनाश आने से पूर्व सत्य बार-बार मनुष्य को सावधान करता है। रावण के मंत्री, मंदोदरी और उसके निकटतम लोग भी उसे चेतावनी दे रहे थे, किंतु जब अहंकार ही मनुष्य की पहचान बन जाए, तब सत्य भी अपमान प्रतीत होने लगता है।
विभीषण का लंका त्यागना चेतना द्वारा स्वयं को अधर्म से अलग कर लेने का प्रतीक बन गया। यही कारण है कि इसके पश्चात आने वाला शरणागति का प्रसंग अत्यंत दिव्य, करुणामय और आध्यात्मिक गहराई से परिपूर्ण प्रतीत होता है। जब विभीषण श्रीराम की शरण में पहुँचे, तब स्वाभाविक रूप से वानर सेना में संशय उत्पन्न हुआ कि शत्रु पक्ष से आए व्यक्ति पर कैसे विश्वास किया जाए। किंतु उसी क्षण श्रीराम ने अपनी असीम करुणा और कृपा को उद्घाटित करते हुए यह दिव्य उद्घोष किया-मम पन शरणागत भयहारी…
कथा व्यास जी ने अत्यंत सुंदर ढंग से समझाया कि परमात्मा की कृपा मनुष्य के अतीत, कुल, परिस्थिति अथवा बाहरी पहचान के आधार पर सीमित नहीं होती, ईश्वरीय कृपा सदैव निष्पक्ष होती है। जिस क्षण कोई जीव सच्चे हृदय से सत्य की ओर मुड़ता है, उसी क्षण परमात्मा उसे अपनी शरण में स्वीकार कर लेते हैं। जब मनुष्य अहंकार, भ्रम और आसक्तियों का त्याग कर सत्य का चयन करता है, तभी उसके जीवन में वास्तविक शरणागति का उदय होता है। इसी भावधारा से कथा गुरु तत्व की ओर प्रवाहित हुई। आदिगुरु शंकराचार्य जी द्वारा रचित गुरु अष्टकम के माध्यम से कथा व्यास जी ने पूर्ण गुरु की वास्तविक पहचान को अत्यंत गहनता से स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि संसार में प्रत्येक स्तर पर मनुष्य को अनेक प्रकार के गुरु मिल सकते हैं, किंतु सच्चा गुरु वही है जो मनुष्य को उसके भीतर विद्यमान ईश्वर का साक्षात्कार करा दे, उसकी सुप्त चेतना को जागृत कर दे और जीवन को आत्मिक दिशा प्रदान करे। कथा में यह भाव अत्यंत प्रभावशाली ढंग से उभरा कि ऐसे पूर्ण गुरु की प्राप्ति कर ईश्वर का प्रत्यक्ष अनुभव करना ही मानव जीवन का परम लक्ष्य है। अंगद-रावण संवाद को कथा व्यास जी ने अत्यंत जीवंत, और ओजस्वी शैली में प्रस्तुत किया। अंगद की अडिग स्थिरता और रावण के प्रचंड अहंकार के मध्य यह संवाद शब्दों का आदान-प्रदान से कहीं आगे बढ़ चुका था, यह संवाद धर्म और अधर्म के सनातन संघर्ष का प्रतीक बनकर उभरा, जिसे अत्यंत सूक्ष्मता से समझाया गया।

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